चौंकाने वाली खबर: कोर्ट ने आज तक की एंकर के खिलाफ दर्ज करने का दिया आदेश — क्या मीडिया पर राज का असर दिखा?
दोस्तों, बड़ी खबर है — लखनऊ की एक अदालत ने आज तक की एंकर अंजना ओम कश्यप के खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 196 और 197 के अंतर्गत मामला दर्ज करने का आदेश दिया है। यह मामला अदालत ने 2 सितंबर 2025 को दर्ज करने का निर्देश दिया। सुनने में अजीब लग सकता है, पर याद रखिए — पहले असम पुलिस ने मेरे (लेखक के) खिलाफ भाजपा के एक कार्यकर्ता की शिकायत पर BNS की तीन धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी थी। दोनों मामलों में फर्क क्या है? आगे बताऊंगा। लेकिन पहले ये जानिए कि मामला क्या है और अदालत ने ऐसा क्यों कहा।
मामला क्या है? — कोर्ट ने कहा शिकायत में “दम” है
रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने अंजना ओम कश्यप और आज तक चैनल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। उनका आरोप है कि 14 अगस्त 2025 को अंजना के शो ब्लैक एंड वाइट में ऐसी बातें और सामग्री चली जो धर्म के आधार पर नफरत पैदा कर रही थीं और धार्मिक भावनाओं को भड़का रही थीं। जब पुलिस ने शिकायत पर एफआईआर नहीं की तो ठाकुर ने सीआरपीसी सेक्शन 200 के तहत अदालत से शिकायत की। अदालत ने शिकायत को प्राथमिक तौर पर सही माना और कहा कि मामला दर्ज किया जाए — इसलिए अब उत्तर प्रदेश पुलिस ने कोर्ट के आदेश के आधार पर केस दर्ज कर दिया। अगले कदम में शिकायतकर्ता (ठाकुर) का बयान रिकॉर्ड करने की तारीख 30 सितंबर 2025 रखी गई है।
कार्यक्रम में क्या दिखाया गया था?
अंजना के उसी कार्यक्रम में यह दावा दिखाया गया कि विभाजन के दौरान 4 करोड़ मुसलमानों में से “सिर्फ 96 लाख” पाकिस्तान गए — और इसे लेकर ताना भी मारा गया कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं होने का जो आरोप हैं वे बेबुनियाद हैं। कार्यक्रम में स्क्रीन पर ग्राफिक्स और पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल भी किया गया — इनमें कुछ तस्वीरें बांग्लादेश की थीं, जहां आज भी हिंदुओं पर हमले की खबरें होती हैं। अमिताभ ठाकुर ने अदालत में कहा कि यह सब दर्शाता है कि कार्यक्रम का मकसद क्या था — धर्म के आधार पर ताना मारना और भावनाएं भड़काना।
मेरा अपना मुक़ाबला — क्या फर्क है दोनों मामलों में?
दोस्तों, आपको याद होगा कि कुछ समय पहले मेरे खिलाफ भी BNS की तीन धाराओं में केस दर्ज हुआ था — शिकायत करने वाले भाजपा कार्यकर्ता आलोक बरवा थे और असम पुलिस ने गंभीर जांच के बिना एफआईआर दर्ज कर दी थी। मैंने सुप्रीम कोर्ट भी जाना और सुप्रीम कोर्ट ने मुझे चार हफ्ते का संरक्षण दिया था। मेरा कार्यक्रम भी सत्ता और नेतृत्व के व्यवहार पर था — मैंने जज के एक वायरल बयान और स्थानीय रिपोर्ट्स की मदद से जमीन पर उठ रहे सवाल उठाए थे, न कि किसी धर्म पर हमला किया था। बावजूद इसके असम पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर दी। इसीलिए मैं कहता हूँ — यहाँ बड़ा फर्क यह है कि अंजना के मामले में अदालत ने आदेश दिया, जबकि मेरे मामले में पुलिस ने पहले ही एफआईआर दर्ज कर दी।
आज के समय में मीडिया का बदलता चेहरा
देखिए, 2007-2012 के बाद से लेकर अब तक आज तक चैनल की जो स्थिति है, उसमें एक बदलाव दिखता है। पहले यह चैनल सत्ता से सवाल उठाता था, पर अब कुछ कार्यक्रमों में ऐसी लाइन दिखती है जो नफरत और वोट बैंक की राजनीति को हवा देती नजर आती है। मैं कह रहा हूँ कि कुछ एंकर और कार्यक्रम ऐसे हैं जो कभी-कभी सीमा पार कर जाते हैं — और अदालत का यह आदेश इसलिए मायने रखता है।
गोदी मीडिया और बिहार बंद — क्या मुद्दा दब गया?
समानांतर रूप से, कल शाम जो बिहार बंद पर बहस होनी चाहिए थी, वह अधिकांश चैनलों में नहीं दिखी — सिर्फ कुछ चैनल्स ने इस पर बात की। इसका मतलब यह निकला कि जनता तक उस बंद का जो संदेश जाना चाहिए था, वह नहीं पहुंचा और यह भाजपा के लिए बैकफायर बन गया। मैं यह भी बताना चाहता हूँ कि मीडिया में “माँ की गाली” वाले मुद्दे पर भी असमान प्रतिक्रिया रही — कुछ चैनल्स ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया, कई ने उस पर ठोस बहस नहीं की। यही दोहरे मापदंड का सवाल है — अगर किसी की माँ का अपमान गलत है तो सब पर बराबर सवाल क्यों नहीं उठते?
कुछ और बातें जो मैंने उठाईं
मैंने अपने कार्यक्रम में यह भी दिखाया था कि:
- कुछ चैनलों ने विभाजन और आंकड़ों को इस तरह पेश किया कि निहित संदेश वोट बैंक की राजनीति पर जाता नजर आया।
- कई बार सत्ता-समर्थक एंकरों और कार्यक्रमों को संरक्षण मिलता है, जबकि उनके कुछ कार्यक्रमों के खिलाफ पहले भी कार्रवाइयां हुई हैं।
- मीडिया में विवाद और सांप्रदायिकता के बीच कभी-कभी असली मुद्दे — जैसे भ्रष्टाचार, जमीन-हड़पने के आरोप वगैरह — छुप जाते हैं।
नतीजा क्या है?
अदालत का आदेश इसीलिए अहम है क्योंकि इसमें पुलिस पर तत्काल कार्रवाई का दबाव नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया ने प्राथमिक रूप से माना कि शिकायत में मामला बनता है। यह एक अलग तरह का सिस्टम संकेत देता है — और आने वाले दिनों में यह मामला अंजना ओम कश्यप के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं। मेरी बात बस इतनी ही है — वक्त आएगा जब कई राज साफ होंगे और पता चलेगा कि पर्दे के पीछे क्या खेल होते रहे हैं।
अंत में एक जरूरी संदेश: मेरे कार्यक्रमों के लिए नोटिफिकेशन का इंतजार मत कीजिए — मेरे चैनल पर जाइए, खुद देखें और अपडेटेड रहिए। स्वतंत्र और आज़ाद पत्रकारिता का समर्थन कीजिए। सच के इस सफ़र में मेरा साथी बनिए — चैनल जॉइन करिए और साथ चलिए।
नमस्कार।
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