15 अगस्त 2025 को पुणे के एक बड़े अस्पताल में 49 साल के बापू बालकृष्ण कोमकर का लिवर ट्रांसप्लांट किया गया। डोनर बनीं उनकी पत्नी, 42 वर्षीय कामिनी कोमकर। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
ट्रांसप्लांट के दो दिन बाद ही बापू बालकृष्ण का शरीर नए लिवर के साथ एडजस्ट नहीं कर पाया और उनकी मौत हो गई। वहीं कुछ दिन बाद डोनर कामिनी की भी हालत अचानक बिगड़ गई। उनका शरीर हाइपोटेंसिव शॉक में चला गया—यानी ब्लड प्रेशर तेजी से गिरा, अंगों को पर्याप्त खून और ऑक्सीजन नहीं मिला और आखिरकार मल्टी ऑर्गन फेलियर से उनकी भी जान चली गई।
परिवार का आरोप – “लापरवाही से गई दोनों की जान”
कोमकर परिवार का कहना है कि अस्पताल ने इलाज के दौरान गंभीर लापरवाही बरती। यही वजह रही कि पति-पत्नी दोनों की मौत हो गई। अब यह मामला केवल अस्पताल पर ही नहीं, बल्कि ऑर्गन ट्रांसप्लांट की सेफ्टी पर भी सवाल खड़ा कर रहा है। खासकर डोनर्स के लिए यह कितना सुरक्षित है?
डॉक्टर बोले – “अधिकतर डोनर सामान्य जिंदगी जीते हैं”
आकाश हेल्थकेयर, सेंटर फॉर लिवर जीआई डिजीजेस एंड ट्रांसप्लांटेशन के डायरेक्टर और सीनियर कंसल्टेंट डॉ. सौरभ सिंघल ने इस पर रोशनी डाली।
उन्होंने बताया –
ज्यादातर मामलों में डोनर्स को कोई बड़ी दिक्कत नहीं होती, वे सामान्य जिंदगी जीते हैं।
लेकिन कभी-कभार ब्लीडिंग, इंफेक्शन, एलर्जी जैसी कॉम्प्लिकेशंस हो सकती हैं।
हल्के लक्षण भी दिख सकते हैं जैसे थकान, पाचन संबंधी दिक्कत, कमजोर इम्युनिटी और दर्द।
लिवर डोनेशन में लिवर का केवल एक हिस्सा निकाला जाता है, जो कुछ समय में दोबारा बढ़कर पहले जैसा हो जाता है।
लेकिन दुर्लभ मामलों में गंभीर कॉम्प्लिकेशंस भी हो सकती हैं—
बाइल लीकेज (पित्त का रिसाव)
हानियां
लिवर का काम बंद होना
और बहुत रेयर केस में हाइपोटेंसिव शॉक और मल्टी ऑर्गन फेलियर
डॉ. सिंघल बताते हैं कि यह स्थिति तब आती है जब शरीर का ब्लड प्रेशर अचानक बहुत नीचे चला जाता है। नतीजतन किडनी, फेफड़े, दिल और लिवर एक-एक करके फेल हो जाते हैं। कारण हो सकते हैं—अत्यधिक ब्लीडिंग, इंफेक्शन (सेप्सिस), एलर्जी या दवाओं के साइड इफेक्ट्स।
डोनर की देखभाल कैसे हो?
आटमस हॉस्पिटल में लिवर ट्रांसप्लांट विभाग के प्रमुख डॉ. गिरिराज बोरा का कहना है कि ट्रांसप्लांट के बाद डोनर की देखभाल बेहद जरूरी है।
वे बताते हैं –
सर्जरी के बाद कुछ दिन डोनर को ICU में मॉनिटरिंग पर रखा जाता है।
जब हालत स्थिर हो जाए तभी रिकवरी विंग में शिफ्ट किया जाता है।
धीरे-धीरे IV ड्रिप की जगह ओरल मेडिसिन (खाने वाली दवाएं) दी जाती हैं।
अगले कुछ महीनों तक रेगुलर फॉलो-अप जरूरी है—जिसमें ब्लड, लिवर और किडनी से जुड़े टेस्ट होते हैं।
डोनर को समय पर दवाइयां लेनी चाहिए, आराम करना चाहिए और हेल्दी डाइट लेनी चाहिए।
शराब और सिगरेट पूरी तरह से बंद करने होते हैं।
डिस्चार्ज के बाद डोनर को कम से कम 2-3 महीने तक भारी सामान नहीं उठाना चाहिए ताकि हर्निया का खतरा न बढ़े।
कमजोरी, बुखार, सांस लेने में तकलीफ या चक्कर आने पर तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
बड़ा सवाल – डोनर्स के लिए कितना सुरक्षित है लिवर ट्रांसप्लांट?
इस दर्दनाक घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर डोनर की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अस्पतालों में क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि सही मेडिकल चेकअप, सख्त पोस्ट-सर्जरी मॉनिटरिंग और डोनर की लाइफस्टाइल मैनेजमेंट से ऐसे हादसों से बचा जा सकता है।
👉 आपकी राय में क्या भारत में ऑर्गन ट्रांसप्लांट सर्जरी के नियम और ज्यादा सख्त होने चाहिए?
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