नई दिल्ली।
याद कीजिए यह वही पाकिस्तानी सेना है जिसकी नाक के नीचे ओसामा बिन लादेन सालों तक एबटाबाद में छिपा रहा और फिर भी अमेरिका ने चुप्पी साध ली। भारत के विदेश मंत्री का ताजा बयान सिर्फ पाकिस्तान को चेतावनी नहीं बल्कि अमेरिका को उसकी भूली हुई यादें भी दिलाने जैसा था। आज जब वॉशिंगटन और इस्लामाबाद फिर से करीब आ रहे हैं, भारत ने साफ कर दिया है कि अमेरिका का इतिहास भूल जाना कोई नई बात नहीं है।
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनते ही दुनिया भर में हलचल तेज हो गई है। भारत पर 50% टैरिफ का ऐलान, रूसी तेल आयात पर सवाल और पाकिस्तान से बढ़ती दोस्ती ने भारत-अमेरिका रिश्तों को नई चुनौती दी है। सवाल बड़ा है – क्या यह रिश्ता सिर्फ राजनीति का खेल है या फिर 21वीं सदी का सबसे मजबूत लोकतांत्रिक गठबंधन?
भारत-अमेरिका रिश्तों की कहानी: दोस्ती और दूरियों का सफर
आजादी के तुरंत बाद से भारत और अमेरिका का रिश्ता उतार-चढ़ावों से गुजरता रहा है।
- 1949: नेहरू और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन की मुलाकात से शुरुआत। उस वक्त दुनिया दो हिस्सों – सोवियत संघ और अमेरिका – में बंटी थी।
- 1955: बांडुंग सम्मेलन। नेहरू, अब्दुल नासिर, सुकर्णो और टीटो जैसे नेताओं ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी। भारत ने साफ कर दिया कि वह किसी खेमे में शामिल नहीं होगा।
- 1971: इंदिरा गांधी के दौर में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध। अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया।
- 1974: भारत का पहला परमाणु परीक्षण। अमेरिका नाराज हुआ और रिश्ते ठंडे पड़ गए।
- 1991: आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत का नया चेहरा दुनिया के सामने आया। आईटी और सर्विस सेक्टर ने अमेरिका को भारत की ओर खींचा।
- 2000: वाजपेयी और जॉर्ज बुश की मुलाकातों से साझेदारी मजबूत हुई।
- 2004: मनमोहन सिंह के दौर में हुआ ऐतिहासिक असैनिक परमाणु समझौता।
- 2014 के बाद: नरेंद्र मोदी ने रिश्तों को और ऊंचाई दी। क्वाड, टेक्नोलॉजी, रक्षा सौदे और निवेश पर साझेदारी गहराई।
दोस्ती की चमक, लेकिन दरारें भी साफ
अमेरिका भारत पर टैरिफ लगाता है, रूस से तेल खरीदने पर सवाल उठाता है, लेकिन चीन और यूरोप पर चुप रहता है। यही है अमेरिकी राजनीति का दोहरा चेहरा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगा और किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेगा।
स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी यानी रणनीतिक स्वायत्तता – भारत की वही नीति है जो अमेरिका और पश्चिमी देशों को चुभती है। भारत साफ है कि वह किसी खेमे में नहीं बंधेगा।
रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की खीझ
2024 में रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की तटस्थता पर अमेरिका ने सवाल उठाए। भारत ने रूस की निंदा नहीं की और उससे सस्ता तेल खरीदना जारी रखा। यही नहीं, भारत-रूस के रक्षा संबंध भी अमेरिका को खटकते हैं।
चीन पर साझेदारी, लेकिन अलग सोच
भारत और चीन की सीमा पर 2020 में गलवन घाटी में खूनी झड़प हो चुकी है। उस वक्त अमेरिका ने भारत को खुफिया मदद दी। लेकिन असल दिक्कत यह है कि अमेरिका चाहता है कि भारत इंडो-पैसिफिक में चीन को रोकने का औजार बने। इसके लिए क्वाड बनाया गया। हालांकि भारत साफ है कि वह क्वाड को सैन्य गठबंधन का रूप नहीं देगा।
अमेरिका और आतंकवाद की कहानी
तालिबान का जन्म ही अमेरिका की नीतियों से हुआ। 1979 में सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिए अफगान गोरिल्ला लड़ाकों को हथियार दिए। वही लड़ाके बाद में तालिबान बने। पाकिस्तान ने इसी दौर में आतंकवाद को पालना-पोसना शुरू किया और भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया। यही आतंकी नेटवर्क आज भी भारत को निशाना बनाता है।
नतीजा: फ्रेंड भी, एनिमी भी
आज की दुनिया बहुध्रुवीय है। चीन आक्रामक है, पाकिस्तान अस्थिर है और सप्लाई चेन बदल रही है। ऐसे में भारत और अमेरिका का रिश्ता सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि एक जटिल फ्रेनिमी (Friends + Enemy) रिश्ता है।
नेहरू से मोदी तक और ट्रूमैन से बाइडन तक, भारत-अमेरिका का सफर दोस्ती और दूरी दोनों का रहा है।
अब देखना होगा कि ट्रंप के नए कार्यकाल में यह रिश्ता किस मोड़ पर जाता है – और क्या अमेरिका भारत को सच्चा साझेदार मानता है या सिर्फ एक मोहरा।
👉 आप क्या सोचते हैं – अमेरिका भारत का सच्चा दोस्त है या सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है?
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