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राजीव गांधी की हत्या: 90 दिनों की वह खोज जो रहस्यमयी सत्य को उजागर करती है!


विवरण:
21 मई 1991 को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। यह एक ऐसी घटना थी जिसने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी और एक जटिल जांच की शुरुआत की। विशेष जांच दल (SIT) ने 90 दिनों तक अथक प्रयासों के बाद इस हत्या के पीछे की साजिश को उजागर किया। जानिए कैसे LTTE ने रची यह साजिश और कैसे एक कैमरे ने बदली जांच की दिशा। क्या आप जानते हैं कि इस मामले में कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं? पूरी कहानी पढ़ें!

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लेख:

21 मई 1991 की रात, श्रीपेरंबुदूर में एक भयानक विस्फोट ने भारत को हिलाकर रख दिया। देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एक आत्मघाती हमले में हत्या कर दी गई। इस घटना ने न केवल भारत की राजनीति को बदल दिया, बल्कि देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती भी पेश की। यह हत्या इतनी जटिल और रहस्यमयी थी कि शुरुआत में किसी को नहीं पता था कि इसके पीछे कौन है। आइए, इस हत्या के पीछे की कहानी और 90 दिनों की उस जांच को जानें, जिसने सत्य को उजागर किया।

हत्या की रात: क्या हुआ था?

21 मई 1991 को, राजीव गांधी विशाखापट्टनम में अपनी चुनावी रैलियों को समाप्त कर मद्रास (अब चेन्नई) के लिए रवाना होने वाले थे। उनके हेलीकॉप्टर में तकनीकी खराबी की सूचना मिली, जिसके कारण वह निराश होकर स्टेट गेस्ट हाउस की ओर लौट रहे थे। लेकिन रास्ते में एक वायरलेस संदेश ने स्थिति बदल दी—हेलीकॉप्टर ठीक हो चुका था। जल्दबाजी में राजीव अपनी सुरक्षा टीम को सूचित किए बिना हवाई अड्डे की ओर बढ़े।

रात 8:30 बजे, मद्रास हवाई अड्डे पर कांग्रेस नेताओं ने उनका स्वागत किया। वह श्रीपेरंबुदूर में एक रैली को संबोधित करने के लिए देर से पहुंचे। रात 10:19 बजे, जैसे ही वह मंच की ओर बढ़े, एक जोरदार विस्फोट हुआ। धुंआ, चीखें और अफरा-तफरी के बीच 18 लोग मारे गए, जिनमें राजीव गांधी भी शामिल थे।

जांच की शुरुआत: एक अंधा मामला

यह भारत के इतिहास में सबसे जटिल हत्याओं में से एक थी। महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी की हत्याओं में हत्यारे मौके पर पकड़े गए थे, लेकिन इस बार कोई सुराग नहीं था। विस्फोट ने सारे सबूत नष्ट कर दिए। LTTE (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) पर शक था, लेकिन कोई पुख्ता सबूत नहीं था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने तुरंत एक आपातकालीन कैबिनेट बैठक बुलाई। RAW, IB और सैन्य खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों से जवाब मांगा गया, लेकिन किसी के पास कोई ठोस जानकारी नहीं थी। इस राष्ट्रीय शर्मिंदगी से बचने के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया, जिसकी अगुवाई CBI निदेशक ने IPS अधिकारी डी.आर. कार्तिकेयन को सौंपी।

कैमरे ने बदली जांच की दिशा

जांच की शुरुआत में SIT के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी सबूतों का अभाव। लेकिन तमिलनाडु के फॉरेंसिक लैब के निदेशक डॉ. चंद्रशेखरन ने अखबारों में छपी तस्वीरों में एक कैमरा देखा। यह कैमरा फोटोग्राफर हरि बाबू का था, जो विस्फोट में मारे गए थे। इस कैमरे में 10 तस्वीरें मिलीं, जिनमें से एक में नारंगी-हरे रंग की पोशाक में एक महिला थी, जिसके हाथ में चंदन की माला थी।

फॉरेंसिक जांच में पता चला कि यह महिला ही आत्मघाती हमलावर थी। तस्वीर में एक अन्य व्यक्ति, सफेद कपड़ों में, नोटबुक लिए खड़ा था। बाद में उसकी पहचान सिवरासन के रूप में हुई, जो LTTE का एक भरोसेमंद सिपाही था।

LTTE का षड्यंत्र: सच्चाई सामने आई

जांच आगे बढ़ी तो कई खुलासे हुए। हरि बाबू के घर से मिली एक चिट्ठी और LTTE प्रमुख प्रभाकरन की तस्वीर ने साबित कर दिया कि इस हत्या के पीछे LTTE का हाथ था। एक अन्य संदिग्ध, शंकर कोनेश्वरन, ने खुलासा किया कि सिवरासन 9 सदस्यों की एक हिट स्क्वाड का नेता था।

SIT ने नलिनी नाम की एक महिला को ट्रैक किया, जो इस साजिश में शामिल थी। नलिनी और उसके प्रेमी मुरुगन को 13 जून 1991 को गिरफ्तार किया गया। मुरुगन एक विस्फोटक विशेषज्ञ था और उसने सायनाइड खाकर आत्महत्या की कोशिश की, लेकिन NSG कमांडो ने उसे जिंदा पकड़ लिया।

LTTE का मकसद: राजीव गांधी को क्यों मारा?

LTTE एक तमिल उग्रवादी संगठन था, जो श्रीलंका में एक स्वतंत्र तमिल देश की मांग कर रहा था। 1987 में भारत-श्रीलंका समझौते के तहत राजीव गांधी ने भारतीय शांति सेना (IPKF) को श्रीलंका भेजा था। LTTE ने इसका विरोध किया और भारतीय सेना के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। 1990 में IPKF की वापसी के बाद भी LTTE को डर था कि अगर राजीव गांधी फिर से PM बने, तो वह दोबारा सेना भेज सकते हैं। इसीलिए, अक्टूबर 1990 में LTTE ने उनकी हत्या की साजिश रची।

जांच का अंत: सिवरासन की मौत

90 दिनों की अथक खोज के बाद, SIT को पता चला कि सिवरासन बैंगलोर के कोननकुंटे में एक सुरक्षित ठिकाने पर छिपा था। 20 अगस्त 1991 को NSG कमांडो ने उस घर पर छापा मारा, लेकिन नौकरशाही की देरी के कारण सिवरासन और उसके साथियों ने सायनाइड खाकर आत्महत्या कर ली।

CBI ने 26 लोगों को इस मामले में आरोपी बनाया। 1998 में TADA कोर्ट ने सभी को मौत की सजा सुनाई, लेकिन 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने केवल 7 की सजा को बरकरार रखा, जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया।

अनुत्तरित सवाल

जांच के बावजूद कई सवाल अनुत्तरित रहे। क्या इस साजिश में कोई और शामिल था? क्या सिवरासन के अंतरराष्ट्रीय संबंध थे? जैन आयोग ने संकेत दिया कि जांच को केवल LTTE तक सीमित रखने का दबाव था। कुछ का मानना था कि विदेशी एजेंसियां, जैसे मोसाद, इसमें शामिल हो सकती थीं, लेकिन इसका कोई सबूत नहीं मिला।


तालिका: राजीव गांधी हत्या मामले की महत्वपूर्ण तारीखें और घटनाएं

तारीखघटना
21 मई 1991राजीव गांधी की श्रीपेरंबुदूर में आत्मघाती हमले में हत्या।
22 मई 1991SIT का गठन, डी.आर. कार्तिकेयन को जांच का नेतृत्व सौंपा गया।
मई 1991हरि बाबू के कैमरे से मिली तस्वीरों ने जांच को नई दिशा दी।
13 जून 1991नलिनी और मुरुगन को मद्रास में गिरफ्तार किया गया।
20 अगस्त 1991सिवरासन और अन्य LTTE सदस्यों ने बैंगलोर में सायनाइड खाकर आत्महत्या की।
28 जनवरी 1998TADA कोर्ट ने 26 आरोपियों को मौत की सजा सुनाई।
11 मई 1999सुप्रीम कोर्ट ने 7 आरोपियों की मौत की सजा बरकरार रखी।
1999 और बाद में7 आरोपियों की सजा को उम्रकैद में बदला गया।

FAQ: राजीव गांधी हत्या मामले के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. राजीव गांधी की हत्या किसने की थी?
लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) ने राजीव गांधी की हत्या की साजिश रची थी। आत्मघाती हमलावर धनु थी, जिसे LTTE के सिवरासन ने नेतृत्व प्रदान किया।

2. हत्या का मकसद क्या था?
LTTE को डर था कि अगर राजीव गांधी दोबारा PM बने, तो वह श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (IPKF) को फिर से भेज सकते हैं, जिसका LTTE ने विरोध किया था।

3. जांच में सबसे महत्वपूर्ण सुराग क्या था?
फोटोग्राफर हरि बाबू के कैमरे से मिली तस्वीरें, जिसमें आत्मघाती हमलावर धनु और सिवरासन दिखाई दिए, ने जांच को नई दिशा दी।

4. सिवरासन को जिंदा क्यों नहीं पकड़ा गया?
नौकरशाही देरी और समन्वय की कमी के कारण NSG कमांडो को सिवरासन के ठिकाने पर छापा मारने में देरी हुई, जिसके कारण उसने सायनाइड खाकर आत्महत्या कर ली।

5. क्या इस मामले में कोई सवाल अनुत्तरित रहे?
हां, जैन आयोग ने संकेत दिया कि जांच को LTTE तक सीमित रखने का दबाव था। सिवरासन के अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अन्य संभावित साजिशकर्ताओं की जांच नहीं हो सकी।


निष्कर्ष:
राजीव गांधी की हत्या भारत के इतिहास में एक दुखद और जटिल अध्याय है। SIT की 90 दिनों की मेहनत ने साजिश को उजागर किया, लेकिन कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। इस घटना ने भारत की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल दिया। क्या आपको लगता है कि इस मामले में और गहराई से जांच होनी चाहिए थी? अपनी राय कमेंट में साझा करें!

Shekhar
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