विवरण: राजस्थान के अजमेर से एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां दृष्टि IAS के संस्थापक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति के खिलाफ न्यायपालिका पर कथित अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर आपराधिक शिकायत पर संज्ञान लिया गया है। अजमेर की अदालत ने उन्हें 22 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। यह मामला उनके वायरल वीडियो “IAS vs Judge: कौन ज्यादा ताकतवर?” से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया और न्यायिक शक्ति पर विवादास्पद बयान दिए थे। आइए, इस मामले को विस्तार से समझते हैं।
राजस्थान के अजमेर की अदालत ने दृष्टि IAS कोचिंग संस्थान के संस्थापक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति के खिलाफ एक आपराधिक मानहानि मामले में सख्त रुख अपनाया है। यह मामला उनके एक वायरल यूट्यूब वीडियो से जुड़ा है, जिसका शीर्षक है “IAS vs Judge: कौन ज्यादा ताकतवर?”। इस वीडियो में डॉ. दिव्यकीर्ति ने कथित तौर पर न्यायपालिका और न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर अपमानजनक और व्यंग्यात्मक टिप्पणियां की थीं। वकील कमलेश मंडोलिया ने इस वीडियो के खिलाफ शिकायत दर्ज की, जिसमें दावा किया गया कि इन टिप्पणियों ने न केवल न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाई, बल्कि जनता, खासकर IAS की तैयारी करने वाले युवाओं के मन में न्यायिक प्रणाली के प्रति अविश्वास पैदा किया।
अजमेर के अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश और न्यायिक मजिस्ट्रेट मनमोहन चंदेल ने मंगलवार को इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने अपने 40 पेज के आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया सबूत दर्शाते हैं कि डॉ. दिव्यकीर्ति ने “तुच्छ प्रसिद्धि” के लिए दुर्भावनापूर्ण इरादे से न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। कोर्ट ने इसे संवैधानिक आलोचना या अकादमिक स्वतंत्रता के दायरे से बाहर माना और इसे न्यायिक प्रणाली पर जानबूझकर किया गया हमला करार दिया। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 356 (1), (2), (3), (4) और आईटी एक्ट की धारा 66A(B) के तहत कार्रवाई की गई है। कोर्ट ने अजमेर पुलिस को मामले की आगे जांच करने और डॉ. दिव्यकीर्ति को 22 जुलाई को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है।
विवाद का केंद्र: “IAS vs Judge” वीडियो
वायरल वीडियो में डॉ. दिव्यकीर्ति ने कथित तौर पर कहा कि “हाई कोर्ट जज बनने के लिए लॉबिंग और मिठाई बांटनी पड़ती है, फिर भी फाइलें आगे नहीं बढ़ती” और “न्यायिक शक्ति एक भ्रम है”। शिकायतकर्ता कमलेश मंडोलिया का कहना है कि ये बयान न्यायपालिका की स्वायत्तता और गरिमा पर सवाल उठाते हैं, जिससे न केवल जजों और वकीलों, बल्कि पूरे न्यायतंत्र का अपमान होता है। कोर्ट ने भी माना कि ऐसी टिप्पणियां जनता में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा कर सकती हैं।
डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का पक्ष
डॉ. दिव्यकीर्ति ने इन आरोपों का खंडन किया है। उनका कहना है कि वीडियो उनके आधिकारिक यूट्यूब चैनल से अपलोड नहीं हुआ और संभवतः किसी तीसरे पक्ष ने इसे संपादित कर प्रसारित किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि यदि वीडियो में उनके बयान शामिल हैं, तो वे सामान्य टिप्पणियां हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती हैं। उनका कहना है कि ये बयान किसी व्यक्ति विशेष को लक्षित नहीं करते। हालांकि, कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और इसकी सामग्री न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने वाली है।
कोर्ट का रुख
कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के अरुंधति रॉय (2002) और प्रशांत भूषण (2020) मामलों का हवाला दिया, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को रेखांकित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है और इसका दुरुपयोग न्यायपालिका का अपमान करने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि न्यायपालिका को बदनाम करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा है।
मामले की समयरेखा
| तारीख | घटना |
|---|---|
| 2 जून 2025 | कमलेश मंडोलिया ने अजमेर कोर्ट में मानहानि की शिकायत दर्ज की। |
| 8 जुलाई 2025 | कोर्ट ने दोनों पक्षों की सुनवाई की और शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार किया। |
| 22 जुलाई 2025 | डॉ. विकास दिव्यकीर्ति को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश। |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. डॉ. विकास दिव्यकीर्ति पर क्या आरोप हैं?
उन पर एक वायरल वीडियो में न्यायपालिका और न्यायाधीशों के खिलाफ अपमानजनक और व्यंग्यात्मक टिप्पणियां करने का आरोप है, जो न्यायिक प्रणाली की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली मानी गई हैं।
2. कोर्ट ने क्या कार्रवाई की है?
अजमेर कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 और आईटी एक्ट की धारा 66A(B) के तहत मामला दर्ज किया है और डॉ. दिव्यकीर्ति को 22 जुलाई को पेश होने का आदेश दिया है।
3. डॉ. दिव्यकीर्ति ने क्या सफाई दी है?
उन्होंने कहा कि वीडियो उनके आधिकारिक चैनल से नहीं है और संभवतः किसी तीसरे पक्ष ने इसे संपादित किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके बयान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में हैं।
4. इस मामले का क्या प्रभाव हो सकता है?
यह मामला न केवल डॉ. दिव्यकीर्ति और दृष्टि IAS के लिए चुनौतीपूर्ण है, बल्कि यह सोशल मीडिया पर सामग्री साझा करने की जिम्मेदारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं पर भी बहस छेड़ सकता है।
निष्कर्ष
यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। डॉ. विकास दिव्यकीर्ति को 22 जुलाई को कोर्ट में पेश होना होगा, और इस सुनवाई के परिणाम पर सबकी नजरें टिकी हैं। यह मामला सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया है, जहां लोग न्यायपालिका की मर्यादा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस कर रहे हैं। आप इस मुद्दे पर क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सूचना के उद्देश्य से लिखा गया है और इसमें दी गई जानकारी विभिन्न स्रोतों से संकलित की गई है। यह किसी भी तरह से कानूनी सलाह या अंतिम निर्णय के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। मामले से संबंधित नवीनतम अपडेट के लिए आधिकारिक स्रोतों और समाचारों का अवलोकन करें।
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